पिता के लिए

 

सडक
चल रही है मेरे संग
तब से
जब मैंने सीखा था चलना|

उँगलियाँ थामे हुए
अपने पिता की,
कुछ हर्षित-सा
कुछ भयभीत-सा
मैंने सीखा था चलना|

आज जब चल पाता हूँ
बिन पकडे उँगलियाँ,
जरुरत महसूस होती है
और भी अधिक|

ज्यादा सक्षम हूँ,
बचपन के मुकाबले
कहीं ज्यादा,
पर भय का रूप
नहीं बदला है,
हाँ, विस्तार हो गया है|

बचपन में जब
गिर जाता था चलते-चलते,
आँसू छलक आते थे:
पर पिता के संग होने से
हौसला रहता था|
पिता द्वारा
“मेरा बहादुर बेटा”
कहने भर से चुप हो जाता था|

आज पिता के सामने
नहीं बाँट पाता
अपना दर्द
जब सशक्त होनी
चहिए थी
मेरी उँगलियाँ,
जिन्हे थामकर
पिता को गर्व होता-

ढूँढ रहा हूँ अपना मुकाम,
ताकि एक दिन
पिता को देख सकूँ
गर्व करता हुआ
मुझ पर,
जिससे जुडे स्वप्न
हिस्सा हैं
उनके जीवन का|

कविता-समय

कहे

और

अनकहे का

अन्तर जिस समय होता है

जो भी होता है

जहाँ कहीं भी होता है -

क्या कभी

इतना स्पष्ट होता है

कि

उकेर सकें उसे

हम

अक्षरों,

शब्दों,

पन्नों,

या फिर

पुस्तकों में?

जतला पाना भी

इस अन्तर को

हो नहीं पाता|

कहीं यही

कविता के जन्म का

समय तो नहीं?

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