कविता-समय

कहे

और

अनकहे का

अन्तर जिस समय होता है

जो भी होता है

जहाँ कहीं भी होता है -

क्या कभी

इतना स्पष्ट होता है

कि

उकेर सकें उसे

हम

अक्षरों,

शब्दों,

पन्नों,

या फिर

पुस्तकों में?

जतला पाना भी

इस अन्तर को

हो नहीं पाता|

कहीं यही

कविता के जन्म का

समय तो नहीं?

समय

समय
कोई अवरोध नहीं जिसका,
मुक्त परिभाषाओं के बन्धन से
नहीं रूकता,
घड़ी की सुईयों के ठहरने
या किसी पथिक की थकन से।

निरन्तर,
निर्विरोध,
निश्चित रूप से
घूमते समय के पहियों के साथ
राही को चलना,
नहीं
शायद दौड़ना पडता है,
पकड़ समय के गतिशील हाथ।

नहीं चाहता
कोई राहगीर कभी,
रहे पीछे समय की गति भुलाकर
पर चाहने से कोई बढ़ता नहीं है
वक्त बढ़ जाता है आगे,
उसे सुलाकर।

कल्पनाओं के सुखद अम्बर से,
सत्यता के कठोर धरातल तक
सोच से अंतर कहीं ज्यादा है,
सीखा पथचर ने एक सबक।

छूने ऊँचाईयों को बढ़ेंगे आगे,
उस बटोही के पाँव हमेशा,
समय को पह्चाना जिसने है
समय का आचरण है ही ऐसा।

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