प्रश्न-उत्तर

हथेली की रेखाओं ने
एक दिन मुझसे प्रश्न किया,
क्यों तुम रोज़ देखते हो हमें,
क्या है हममें ऐसा?
क्या हम तुम्हारा जीवन हैं,
या हम ही तुम्हारे
सफलता-असफलता
के कारण हैं?

मैं चुपचाप मुस्काया,
उनके उत्तर में इतना ही कह पाया-
तुम सिर्फ मेरे हाथ की
वो रेखाएँ नहीं हो
जो भाग्य का निर्धारण करती हैं,
तुममें छुपा है मेरा बीता कल|
भविष्य की बात मैं नहीं जानता,
मगर तुम सब ही तो
साक्षी रहीं थीं,
उस स्नेहिल स्पर्श की,
अपनेपन से भरे छुअन की,
जो मेरे हाथों ने अनुभव किया था|

भावनाएँ छुपी हैं मेरी इन्हीं
रेखाओं में,
और मैं उन पलों को
सदैव समीप महसूस करता हूँ-
तुम सबको देखकर|
 

पिता के लिए

 

सडक
चल रही है मेरे संग
तब से
जब मैंने सीखा था चलना|

उँगलियाँ थामे हुए
अपने पिता की,
कुछ हर्षित-सा
कुछ भयभीत-सा
मैंने सीखा था चलना|

आज जब चल पाता हूँ
बिन पकडे उँगलियाँ,
जरुरत महसूस होती है
और भी अधिक|

ज्यादा सक्षम हूँ,
बचपन के मुकाबले
कहीं ज्यादा,
पर भय का रूप
नहीं बदला है,
हाँ, विस्तार हो गया है|

बचपन में जब
गिर जाता था चलते-चलते,
आँसू छलक आते थे:
पर पिता के संग होने से
हौसला रहता था|
पिता द्वारा
“मेरा बहादुर बेटा”
कहने भर से चुप हो जाता था|

आज पिता के सामने
नहीं बाँट पाता
अपना दर्द
जब सशक्त होनी
चहिए थी
मेरी उँगलियाँ,
जिन्हे थामकर
पिता को गर्व होता-

ढूँढ रहा हूँ अपना मुकाम,
ताकि एक दिन
पिता को देख सकूँ
गर्व करता हुआ
मुझ पर,
जिससे जुडे स्वप्न
हिस्सा हैं
उनके जीवन का|

« Previous entries · Next entries »