दीपक कुमार का ब्लॉग
March 16, 2006 at 11:02 am (आरम्भ)
कविता तो बस जीवन है, हमें सहलाती, बहलाती, पुचकारती………
कई बातें चाह कर भी,हम कह नहीं पाते हैं|
भावनाओं के बहाव में हमारे शब्द बह जाते हैं|
कुछ लम्हें जिनमें हम सोचते जाते हैं|
शब्दों के रूप में उभरकर वे विचार कवितायें बन जाते हैं।