तयशुदा
नियत-से
जीवन में,
जब भी कुछ
अचानक से
घटता है –
अप्रत्याशित,
अनचाहा –
जी रहा आदमी
रह जाता है
भौंचक्का,
जैसे
पटरी से उतर गयी हो
एक रेलगाड़ी,
छोटा बच्चा
ठोकर लगने से
गिर गया हो जैसे,
मगर कुछ समय बाद
आदमी समझ जाता है ,
जान जाता है सच्चाई
कि नहीं होता कुछ भी
नियत या तयशुदा,
सब बस खेल हैं
नियति के;
और वह
चल पड़ता है पुन:
अगली बार
भौचक्का होने तक |