(१)
शब्दों के खण्डहर
अतीत से जुड़े हैं,
जहाँ कभी
बिन शब्दों के
बातें होती थीं।
(२)
शब्दों से
बुनता हूँ
घरौन्दा,
और अर्थों से
तुम
सजाती हो उसे।
(३)
शब्द
नहीं कह सकेंगे
मेरी बातें,
अच्छा है
मैं खामोश रहूँ
और तुम सुनती रहो।
(४)
बदल जाते हैं
अर्थ
कई बार,
मगर
शब्द वही रहते हैं।
(५)
बस इतना ही
कि
जब भी कोई
शब्द कहूँ
वह
तुम्हारा ही नाम हो।
(६)
कुछ शब्द
ठहर जाते हैं
एक जगह,
उनके अर्थ
निकल जाते हैं
दूर कहीं।
(७)
वाक्य ने कहा-
मैं हूँ
तभी शब्द भी हैं,
शब्द
एक -एक कर
खिसक गए,
फिर वाक्य
कहीं नहीं था।
mehek said,
July 18, 2009 at 6:15 pm
अच्छा है
मैं खामोश रहूँ
और तुम सुनती रहो।
kya baat hai bahut khub