प्यार और विश्वास

केवल मैं ही तुम्हें प्यार नहीं करता|

हाँ, यह सच है

केवल मैं ही तुम्हें प्यार नहीं करता|

मेरे कान

तुम्हारे शब्दों से प्रेम करते हैं,

तुम्हारे हाथों को चाहती हैं

मेरी उंगलियाँ,

मेरी नजरें भी

तुम्हारे चेहरे को ही

ढूँढती हैं,

मेरे होठ भी

तुम्हारे होठों के

स्पर्श की बाट जोहते हैं;

और इन सबके बाद भी

जब तुम कहती हो

कि

तुम मुझे प्यार नहीं करते,

तब-

मेरा विश्वास प्यार पर से

उठने-उठने को होता है,

और मैं घबराकर

दूर चला जाता हूँ तुमसे

तभी-

निगाहों में तुम झलक जाती हो

और तब

मेरा विश्वास

इस प्यार पर

और भी  गहरा जाता है|

12s टिप्पणियाँ

  1. मार्च 13, 2007 at 1:25 अपराह्न

    बड़ी उहापोह की स्थिती में रचित रचना-बहुत बढ़िया वर्णित किया है मनःस्थिती को… :)

  2. मार्च 13, 2007 at 1:48 अपराह्न

    बहुत खूब… पहली पंक्ति पढ़कर लगा शायद कोई रक़ीब मिल गया है :)

  3. manya said,

    मार्च 13, 2007 at 4:16 अपराह्न

    pyaari panktiyan chhoti aur gahari.. good to read .. thnx

  4. Manish said,

    मार्च 14, 2007 at 5:23 पूर्वाह्न

    हम्म सही है । इस कविता का प्रेरणा स्रोत सरोजनी भवन तो नहीं हैं ना :)

  5. मार्च 15, 2007 at 2:17 पूर्वाह्न

    प्यार का विश्वास दिलाने का प्रयास उत्तम लगा!

  6. दीपक said,

    मार्च 15, 2007 at 6:24 पूर्वाह्न

    आप सबका धन्यवाद|

    @राम चन्द्र मिश्र
    :)

    @ समीर लाल

    आपने सही पकडा| ऐसी ही मनस्थिती मे ये कविता हुई है|

    @प्रतीक

    भई, आप तो रक़ीब नही हैं न मेरे :)

    @मान्या

    कविता पसन्द करने का शुक्रिया

    @ मनीष

    माना कि सरोजनी भवन के समीप (जवाहर भवन) ही रहता हूँ, इसका ये मतलब तो नहीं कि प्रेरणा के लिए भी उन पर निर्भर करूँ| वैसे आपके सम्पर्क वहाँ से होने की महक आ रही है|

    @अनूप शुक्ला

    प्यार पर विश्वास हो, यही सबसे जरुरी है| आपकी टिप्पणी से हौसला मिलता है|

  7. मनीष said,

    मार्च 15, 2007 at 5:37 अपराह्न

    अरे बिलकुल जरूरी नहीं जी कि सामने से ही प्रेरणा ली जाए ! हाँ, हम भी कभी इस छात्रावास के बाशिंदे थे ! :)

  8. Naveen Kumar said,

    मई 10, 2007 at 9:24 पूर्वाह्न

    Yah kavyatarang hamare man mein hiloren uchchhla rahi hai to………
    yahi Deepak ki lau hai.

  9. जुलाई 29, 2007 at 10:53 अपराह्न

    बढिया रचना…

    आपको मुबारकबाद…

    विजयकुमार दवे / Vijaykumar Dave
    http://vijaykumardave.blogspot.com

  10. Atul Joshipura said,

    अप्रैल 13, 2008 at 10:17 पूर्वाह्न

    pyaar koi bhavnaa nahi hai ,apkaa ‘astitva’ hai , pyaar ke upar vishwash ka matlab aap ke astitva par vishvas. We are fish in ocean of love ,dead when out of ocean

  11. जून 14, 2009 at 5:32 अपराह्न

    ek nasa hai tajmahal ek khusbu hai


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