प्यार और विश्वास
March 13, 2007 at 8:32 am (कविता)
केवल मैं ही तुम्हें प्यार नहीं करता|
हाँ, यह सच है
केवल मैं ही तुम्हें प्यार नहीं करता|
मेरे कान
तुम्हारे शब्दों से प्रेम करते हैं,
तुम्हारे हाथों को चाहती हैं
मेरी उंगलियाँ,
मेरी नजरें भी
तुम्हारे चेहरे को ही
ढूँढती हैं,
मेरे होठ भी
तुम्हारे होठों के
स्पर्श की बाट जोहते हैं;
और इन सबके बाद भी
जब तुम कहती हो
कि
तुम मुझे प्यार नहीं करते,
तब-
मेरा विश्वास प्यार पर से
उठने-उठने को होता है,
और मैं घबराकर
दूर चला जाता हूँ तुमसे
तभी-
निगाहों में तुम झलक जाती हो
और तब
मेरा विश्वास
इस प्यार पर
और भी गहरा जाता है|
राम चन्द्र मिश्र said,
March 13, 2007 at 12:11 pm
समीर लाल said,
March 13, 2007 at 1:25 pm
बड़ी उहापोह की स्थिती में रचित रचना-बहुत बढ़िया वर्णित किया है मनःस्थिती को…
Pratik Pandey said,
March 13, 2007 at 1:48 pm
बहुत खूब… पहली पंक्ति पढ़कर लगा शायद कोई रक़ीब मिल गया है
manya said,
March 13, 2007 at 4:16 pm
pyaari panktiyan chhoti aur gahari.. good to read .. thnx
Manish said,
March 14, 2007 at 5:23 am
हम्म सही है । इस कविता का प्रेरणा स्रोत सरोजनी भवन तो नहीं हैं ना
अनूप शुक्ला said,
March 15, 2007 at 2:17 am
प्यार का विश्वास दिलाने का प्रयास उत्तम लगा!
दीपक said,
March 15, 2007 at 6:24 am
आप सबका धन्यवाद|
@राम चन्द्र मिश्र
@ समीर लाल
आपने सही पकडा| ऐसी ही मनस्थिती मे ये कविता हुई है|
@प्रतीक
भई, आप तो रक़ीब नही हैं न मेरे
@मान्या
कविता पसन्द करने का शुक्रिया
@ मनीष
माना कि सरोजनी भवन के समीप (जवाहर भवन) ही रहता हूँ, इसका ये मतलब तो नहीं कि प्रेरणा के लिए भी उन पर निर्भर करूँ| वैसे आपके सम्पर्क वहाँ से होने की महक आ रही है|
@अनूप शुक्ला
प्यार पर विश्वास हो, यही सबसे जरुरी है| आपकी टिप्पणी से हौसला मिलता है|
मनीष said,
March 15, 2007 at 5:37 pm
अरे बिलकुल जरूरी नहीं जी कि सामने से ही प्रेरणा ली जाए ! हाँ, हम भी कभी इस छात्रावास के बाशिंदे थे !
Naveen Kumar said,
May 10, 2007 at 9:24 am
Yah kavyatarang hamare man mein hiloren uchchhla rahi hai to………
yahi Deepak ki lau hai.
Vijaykumar Dave said,
July 29, 2007 at 10:53 pm
बढिया रचना…
आपको मुबारकबाद…
विजयकुमार दवे / Vijaykumar Dave
http://vijaykumardave.blogspot.com
Atul Joshipura said,
April 13, 2008 at 10:17 am
pyaar koi bhavnaa nahi hai ,apkaa ‘astitva’ hai , pyaar ke upar vishwash ka matlab aap ke astitva par vishvas. We are fish in ocean of love ,dead when out of ocean