कथा-पात्र

धूप की ओट में, जब
रूका था कुछ देर,
जीवन की भाग-दौड से
थोडा समय निकाल कर
सुस्ताने लगा था…
ख्याल आया कि
मैं तो किसी
कथा का पात्र हूँ|

किसी कथाकार द्वारा
सृजित हूँ मैं,
और मेरा सृजक…|
मेरा सृजक ,
जिसे मैं कथाकार मानता हूँ;
शायद गलियों में भटक रहा होगा|

क्योंकि मेरी कहानी तो बेकार है,
मेरे चरित्र में
ऐसा कुछ भी नहीं-
जो उस कथाकार को
यश दिला सके|

मैं कोई ‘ईदगाह’ का
‘हामिद’ नहीं,
जिसके चिमटे खरीदने से
लोगों के आँखें नम हो जाएँ|

‘गुनाहों का देवता’ के
‘चन्दर’ की भाँति
मेरे हृदय में
प्रेम की पवित्र अग्नि भी नहीं,
जो पाठक को खींच सके एक गहराई में|

मेरा सृजन शायद
रचनाकार की आत्म-संतुष्टि का
साधन रहा हो,
क्योंकि सीधी-सपाट जिन्दगी भी
कहानी का आधार हो सकती है,
पर मैं उससे भी सम्बन्ध नहीं रखता|

मैं तो अपनी कहानी का
अकेला पात्र हूँ,
अगर और पात्र होते तो भी,
संवादहीन ही होती मेरी कहानी|

कहानी की पहली पन्क्ति से
आन्तिम पन्क्ति तक,
ढूँढता रहा वह जगह,
जहाँ से देख सकूँ
मेरे होने का मतलब|
मगर व्यर्थ, सब व्यर्थ|

काश मैं दिला पाता अपने
सृजक को प्रसिद्धि और सम्मान|
मेरा कथाकार तो पुनः
दूसरे पात्र का सृजन कर
पा सकता है नाम और यश |
मगर मैं …..
मैं तो फंस चुका हूँ,
अपनी ही कहानी में|

काश कि मैं अपना कथाकार
खुद होता,
और तब शायद बदल पाता
अपनी कहानी-
जो बेकार नहीं होती|