प्रश्न-उत्तर

हथेली की रेखाओं ने
एक दिन मुझसे प्रश्न किया,
क्यों तुम रोज़ देखते हो हमें,
क्या है हममें ऐसा?
क्या हम तुम्हारा जीवन हैं,
या हम ही तुम्हारे
सफलता-असफलता
के कारण हैं?

मैं चुपचाप मुस्काया,
उनके उत्तर में इतना ही कह पाया-
तुम सिर्फ मेरे हाथ की
वो रेखाएँ नहीं हो
जो भाग्य का निर्धारण करती हैं,
तुममें छुपा है मेरा बीता कल|
भविष्य की बात मैं नहीं जानता,
मगर तुम सब ही तो
साक्षी रहीं थीं,
उस स्नेहिल स्पर्श की,
अपनेपन से भरे छुअन की,
जो मेरे हाथों ने अनुभव किया था|

भावनाएँ छुपी हैं मेरी इन्हीं
रेखाओं में,
और मैं उन पलों को
सदैव समीप महसूस करता हूँ-
तुम सबको देखकर|
 

5 Comments

  1. ratna said,

    September 6, 2006 at 4:30 pm

    बहुत सुन्दर।

  2. September 6, 2006 at 5:00 pm

    बहुत बढिया ,दीपक

    आढी- तिरछी रेखाएँ ही तो हो,
    कितने रहस्य लेकर साथ अपने,
    निरन्तर पथ बदलती हो|

    नही आते समझ तुम्हारे समीकरण,
    फिर भी जाना है मैंने अब तक
    स्पष्ट हो या अस्पष्ट,
    मेरे कल-आज और कल की
    तुम तस्वीर हो|

  3. SHUAIB said,

    September 7, 2006 at 5:40 am

    बहुत बढिया

  4. raakesh khandelavaal said,

    September 7, 2006 at 7:26 pm

    दीपक

    अच्छी सोच है. लिखते रहो

  5. Atul Joshipura said,

    April 13, 2008 at 10:01 am

    It’s beautiful expreson and very touchy


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