हथेली की रेखाओं ने
एक दिन मुझसे प्रश्न किया,
क्यों तुम रोज़ देखते हो हमें,
क्या है हममें ऐसा?
क्या हम तुम्हारा जीवन हैं,
या हम ही तुम्हारे
सफलता-असफलता
के कारण हैं?
मैं चुपचाप मुस्काया,
उनके उत्तर में इतना ही कह पाया-
तुम सिर्फ मेरे हाथ की
वो रेखाएँ नहीं हो
जो भाग्य का निर्धारण करती हैं,
तुममें छुपा है मेरा बीता कल|
भविष्य की बात मैं नहीं जानता,
मगर तुम सब ही तो
साक्षी रहीं थीं,
उस स्नेहिल स्पर्श की,
अपनेपन से भरे छुअन की,
जो मेरे हाथों ने अनुभव किया था|
भावनाएँ छुपी हैं मेरी इन्हीं
रेखाओं में,
और मैं उन पलों को
सदैव समीप महसूस करता हूँ-
तुम सबको देखकर|
ratna said,
September 6, 2006 at 4:30 pm
बहुत सुन्दर।
शिल्पा said,
September 6, 2006 at 5:00 pm
बहुत बढिया ,दीपक
आढी- तिरछी रेखाएँ ही तो हो,
कितने रहस्य लेकर साथ अपने,
निरन्तर पथ बदलती हो|
नही आते समझ तुम्हारे समीकरण,
फिर भी जाना है मैंने अब तक
स्पष्ट हो या अस्पष्ट,
मेरे कल-आज और कल की
तुम तस्वीर हो|
SHUAIB said,
September 7, 2006 at 5:40 am
बहुत बढिया
raakesh khandelavaal said,
September 7, 2006 at 7:26 pm
दीपक
अच्छी सोच है. लिखते रहो
Atul Joshipura said,
April 13, 2008 at 10:01 am
It’s beautiful expreson and very touchy