हथेली की रेखाओं ने
एक दिन मुझसे प्रश्न किया,
क्यों तुम रोज़ देखते हो हमें,
क्या है हममें ऐसा?
क्या हम तुम्हारा जीवन हैं,
या हम ही तुम्हारे
सफलता-असफलता
के कारण हैं?
मैं चुपचाप मुस्काया,
उनके उत्तर में इतना ही कह पाया-
तुम सिर्फ मेरे हाथ की
वो रेखाएँ नहीं हो
जो भाग्य का निर्धारण करती हैं,
तुममें छुपा है मेरा बीता कल|
भविष्य की बात मैं नहीं जानता,
मगर तुम सब ही तो
साक्षी रहीं थीं,
उस स्नेहिल स्पर्श की,
अपनेपन से भरे छुअन की,
जो मेरे हाथों ने अनुभव किया था|
भावनाएँ छुपी हैं मेरी इन्हीं
रेखाओं में,
और मैं उन पलों को
सदैव समीप महसूस करता हूँ-
तुम सबको देखकर|