सडक
चल रही है मेरे संग
तब से
जब मैंने सीखा था चलना|उँगलियाँ थामे हुए
अपने पिता की,
कुछ हर्षित-सा
कुछ भयभीत-सा
मैंने सीखा था चलना|आज जब चल पाता हूँ
बिन पकडे उँगलियाँ,
जरुरत महसूस होती है
और भी अधिक|ज्यादा सक्षम हूँ,
बचपन के मुकाबले
कहीं ज्यादा,
पर भय का रूप
नहीं बदला है,
हाँ, विस्तार हो गया है|बचपन में जब
गिर जाता था चलते-चलते,
आँसू छलक आते थे:
पर पिता के संग होने से
हौसला रहता था|
पिता द्वारा
“मेरा बहादुर बेटा”
कहने भर से चुप हो जाता था|आज पिता के सामने
नहीं बाँट पाता
अपना दर्द
जब सशक्त होनी
चहिए थी
मेरी उँगलियाँ,
जिन्हे थामकर
पिता को गर्व होता-ढूँढ रहा हूँ अपना मुकाम,
ताकि एक दिन
पिता को देख सकूँ
गर्व करता हुआ
मुझ पर,
जिससे जुडे स्वप्न
हिस्सा हैं
उनके जीवन का|
पिता के लिए
अगस्त 19, 2006 at 8:57 पूर्वाह्न (कविता)
pratyaksha26 said,
अगस्त 21, 2006 at 5:04 पूर्वाह्न
अच्छी कविता लगी
अमिताभ त्रिपाठी said,
अगस्त 29, 2006 at 3:27 अपराह्न
ह्रषीकेश दा पर लिखे गये मेरे चिट्ठे पर टिप्पणी के लिये धन्यवाद आपकी कवितायें अत्यन्त मर्मस्पर्शी हैं.
renu ahuja said,
सितम्बर 6, 2006 at 8:02 पूर्वाह्न
jihoney sikhaayaa oongli pakad kar chalnaa,
oonhi ki oongliyaa aub hamaraa haath thaamnaa chaahti hain,
Deepak, aapki kavitaa bhut gehrey bhaav liye hai, apnee lekhani ko isee tarah sey lekhan kartey raho.
shubhkaamnaayen.
राजेंद्र माहेश्वरी said,
अगस्त 9, 2008 at 10:13 पूर्वाह्न
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Thanks
Ram Tripathy said,
अक्टूबर 22, 2009 at 11:53 पूर्वाह्न
such bahute acchee poem hai bahut karib se dil ke nikalte hai chu kar are aap to bahute accha likhate hain babu.