समय
कोई अवरोध नहीं जिसका,
मुक्त परिभाषाओं के बन्धन से
नहीं रूकता,
घड़ी की सुईयों के ठहरने
या किसी पथिक की थकन से।
निरन्तर,
निर्विरोध,
निश्चित रूप से
घूमते समय के पहियों के साथ
राही को चलना,
नहीं
शायद दौड़ना पडता है,
पकड़ समय के गतिशील हाथ।
नहीं चाहता
कोई राहगीर कभी,
रहे पीछे समय की गति भुलाकर
पर चाहने से कोई बढ़ता नहीं है
वक्त बढ़ जाता है आगे,
उसे सुलाकर।
कल्पनाओं के सुखद अम्बर से,
सत्यता के कठोर धरातल तक
सोच से अंतर कहीं ज्यादा है,
सीखा पथचर ने एक सबक।
छूने ऊँचाईयों को बढ़ेंगे आगे,
उस बटोही के पाँव हमेशा,
समय को पह्चाना जिसने है
समय का आचरण है ही ऐसा।
हितेन्द्र said,
April 17, 2006 at 7:04 pm
वाह वाह। बहुत अच्छे।
शिल्पा said,
August 22, 2006 at 4:19 pm
परम सत्य को उचित शब्दों का अम्बर पहनाकर, उत्कृष्ट कोटी के भावों से अलंकृत किया है आपने|