शून्य

शून्य,
नगण्य-सा लगने वाला
एक अनन्त का प्रतीक है,
सीमाओं का अतिक्रमण भी
इतना आसान नहीं होता|

छुपाए कई रहस्य भीतर
गणित से कहीं ऊपर,
शून्य एक दुनिया है
मात्र एक अंक नहीं
जीवन्त अनुभूति है|

शून्य तलाश करता है
खालीपन का यथार्थ,
किताबों की जागीर नहीं ये
विस्तृत है इसका शब्दार्थ|

नेत्रों के बंद होने से
शून्य ही दिखने लगता है
बढने लगता है अन्तहीन
किसी दिशा की ओर
बिना डरे ,
रूकना नहीं चाहता शायद|

परिभाषित करना कठिन है
शून्य को पन्क्तियों में|

और ढूंढ रहे हैं सभी
शून्य को
जैसे वही सत्य हो|

पर शून्य तो कस्तूरी है
मृग की तरह भटकना
मानव की मज़बूरी है,
जीवन के छोरों पर
शून्य ही तो है
जिस पर
टिकी हुई है
सांसों की डोर शायद|

5 Comments

  1. April 7, 2006 at 1:48 pm

    बहुत सुंदरता से शून्य महात्म वर्णित किया है,बधाई दीपक,

    “शून्य से शून्य का
    लम्बा है सफर,
    हो रही है जिन्दगी
    इस तरह ये बसर,

    किस बात का गुमां
    और किससे शिकवा,
    हासिल है बस शून्य
    पूरा हो जब सफर।”

    -समीर लाल’समीर’

  2. renu ahuja said,

    April 7, 2006 at 9:05 pm

    दीपक बहुत प्यारी रचना है, कहीं कही छायावादिता के भी भाव है इसमें, हमारे विचार में तो …

    शून्य अनंत के बाद की है स्‍थिति,
    जब मन भाव शून्यता की करे संगति,
    अनंत आकाश, शून्यता का अह्सास,
    असीम की भी एक परिधि,
    करवाता ज्ञात,
    शून्य मात्र शून्य नही,
    अशून्यता का भी वागर्थ…!!!!
    -रेणु.

  3. प्रेमलता पांडे said,

    April 8, 2006 at 3:59 pm

    शून्य ही तो कटु सत्य है। असीम अनंत शून्य में ही तो समस्त ब्रह्मांड है। अंत में सब शून्य ही तो है।

    शून्य कस्तूरी कहकर दीपक आपने बहुत गहरी मीमांसा लिख दी।
    बहुत गहरा भाव है शून्य को कस्तूरी कहना। गूढ़ार्थ लिए है। सुंदर।

                  – प्रेमलता पांडे

  4. PRAVEEN Baliya said,

    April 17, 2006 at 4:19 am

    Buddhha ki yaad diladi jisne kahatha sarvam shunyam (0) arthat sabhi kuchh ) 0 hai mera prasna hai ki kya hai antar 0 mein aur Purna mein is par main ne ek rachana likhi thi abhi yad nahi kar pa raha khojne se milne par bhejunga kintu aap ki gahari soch ke liye badhai swikaren dhanyavad

  5. rajesh ranjan said,

    July 28, 2006 at 6:42 am

    Deepak Bhai,
    Comparing ‘Zero’ with ‘Infinity ‘ is a nice perception and mathematically, it can be interesting thinking on it.As zero can’t be measured, can’t be bounded.Zero is complete(purn),so it can’t be emptied also.This poem made me remember of ‘purnahuti mantra’

    ‘Aum purn-madah,purn-midam ,puranad purn mudachayate, purnashaya purnmadaya purnmeywa vashishyate.’

    Congratulations.


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