शून्य
April 7, 2006 at 12:20 pm (कविता)
शून्य,
नगण्य-सा लगने वाला
एक अनन्त का प्रतीक है,
सीमाओं का अतिक्रमण भी
इतना आसान नहीं होता|
छुपाए कई रहस्य भीतर
गणित से कहीं ऊपर,
शून्य एक दुनिया है
मात्र एक अंक नहीं
जीवन्त अनुभूति है|
शून्य तलाश करता है
खालीपन का यथार्थ,
किताबों की जागीर नहीं ये
विस्तृत है इसका शब्दार्थ|
नेत्रों के बंद होने से
शून्य ही दिखने लगता है
बढने लगता है अन्तहीन
किसी दिशा की ओर
बिना डरे ,
रूकना नहीं चाहता शायद|
परिभाषित करना कठिन है
शून्य को पन्क्तियों में|
और ढूंढ रहे हैं सभी
शून्य को
जैसे वही सत्य हो|
पर शून्य तो कस्तूरी है
मृग की तरह भटकना
मानव की मज़बूरी है,
जीवन के छोरों पर
शून्य ही तो है
जिस पर
टिकी हुई है
सांसों की डोर शायद|