परम्परा

परम्परा,
कुछ सिखाती है हमें,
नयेपन की ओर जाने से
नहीं रोकती कभी
पर इतना तो अवश्य कहती है
कि जाने से पहले एक बार,
बस एक बार, सोचो, समझो;
अपने विचारों को, अपने सोच को
गलत मत होने देना
नई राह हमेशा सही हो,
यह कहना तो कठिन है
पर जाने के बाद
वापस लौटना
कदापि सम्भव नहीं है,
परम्परा भी तो जीवन है
कई अनुभवों का परिष्कॄत स्वरूप;
परम्परा ढ़ोई नहीं जाती,
वह तो खुद-ब-खुद चलती है,
यही वह तत्त्व है जिसने
मनुष्य होने को बचाये रखा है।

3 Comments

  1. April 1, 2006 at 1:46 pm

    अच्छा लिख रहे हैं दीपक जी और विषय भी बहुत बढिया उठाया है.
    बधाई.
    समीर

  2. जीतू said,

    April 1, 2006 at 5:13 pm

    दीपक भाई,
    बहुत सुन्दर है। कविता क्या है पूरी की पूरी विचार श्रृंखला है।
    सबसे सुन्दर ये लाइनें है :

    परम्परा भी तो जीवन है
    कई अनुभवों का परिष्कॄत स्वरूप;
    परम्परा ढ़ोई नहीं जाती,
    वह तो खुद-ब-खुद चलती है,
    यही वह तत्त्व है जिसने
    मनुष्य होने को बचाये रखा है।

    ऐसी कविताएं लगातार लिखते रहिए।

    आप आईआईटी रुड़की में हो?

  3. April 3, 2006 at 1:25 am

    बढ़िया है।


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