April 12, 2006 at 2:16 pm (कविता)
समय
कोई अवरोध नहीं जिसका,
मुक्त परिभाषाओं के बन्धन से
नहीं रूकता,
घड़ी की सुईयों के ठहरने
या किसी पथिक की थकन से।
निरन्तर,
निर्विरोध,
निश्चित रूप से
घूमते समय के पहियों के साथ
राही को चलना,
नहीं
शायद दौड़ना पडता है,
पकड़ समय के गतिशील हाथ।
नहीं चाहता
कोई राहगीर कभी,
रहे पीछे समय की गति भुलाकर
पर चाहने से कोई बढ़ता नहीं है
वक्त बढ़ जाता है आगे,
उसे सुलाकर।
कल्पनाओं के सुखद अम्बर से,
सत्यता के कठोर धरातल तक
सोच से अंतर कहीं ज्यादा है,
सीखा पथचर ने एक सबक।
छूने ऊँचाईयों को बढ़ेंगे आगे,
उस बटोही के पाँव हमेशा,
समय को पह्चाना जिसने है
समय का आचरण है ही ऐसा।
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April 7, 2006 at 12:20 pm (कविता)
शून्य,
नगण्य-सा लगने वाला
एक अनन्त का प्रतीक है,
सीमाओं का अतिक्रमण भी
इतना आसान नहीं होता|
छुपाए कई रहस्य भीतर
गणित से कहीं ऊपर,
शून्य एक दुनिया है
मात्र एक अंक नहीं
जीवन्त अनुभूति है|
शून्य तलाश करता है
खालीपन का यथार्थ,
किताबों की जागीर नहीं ये
विस्तृत है इसका शब्दार्थ|
नेत्रों के बंद होने से
शून्य ही दिखने लगता है
बढने लगता है अन्तहीन
किसी दिशा की ओर
बिना डरे ,
रूकना नहीं चाहता शायद|
परिभाषित करना कठिन है
शून्य को पन्क्तियों में|
और ढूंढ रहे हैं सभी
शून्य को
जैसे वही सत्य हो|
पर शून्य तो कस्तूरी है
मृग की तरह भटकना
मानव की मज़बूरी है,
जीवन के छोरों पर
शून्य ही तो है
जिस पर
टिकी हुई है
सांसों की डोर शायद|
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