मैं
March 30, 2006 at 7:08 am (कविता)
किस तरह
तुम्हें याद करूँ ?
आखिर
कौन-सी बात है
जिससे जोड़ कर
तुम्हें महसूस सकूँ ?
कहाँ हैं वे चीज़ें
जिनमें बसती हो
गन्ध तुम्हारी ?
कैसे सोचूँ आज
फिर से
तुम्हारी स्मृति को?
जब जानता हूँ
कि तुम
अपना सब-कुछ
समेट कर ले गई हो।
पर तुम्हें नही पता शायद ;
तुम्हारी एक चीज़ छूट गई है,
जरा देखना, कहीं वह “मैं” तो नही ?
समीर लाल said,
March 30, 2006 at 1:21 pm
अच्छी रचना है, बधाई.
समीर
Pratik Pandey said,
March 30, 2006 at 4:53 pm
बहुत अच्छी कविता है। उम्मीद है कि आपकी रचनाधर्मिता ‘शब्दायन’ पर इसी तरह प्रस्फुटित होती रहेगी।