मैं

किस तरह
तुम्हें याद करूँ ?

आखिर
कौन-सी बात है
जिससे जोड़ कर
तुम्हें महसूस सकूँ ?

कहाँ हैं वे चीज़ें
जिनमें बसती हो
गन्ध तुम्हारी ?

कैसे सोचूँ आज
फिर से
तुम्हारी स्मृति को?

जब जानता हूँ
कि तुम
अपना सब-कुछ
समेट कर ले गई हो।

पर तुम्हें नही पता शायद ;
तुम्हारी एक चीज़ छूट गई है,

जरा देखना, कहीं वह “मैं” तो नही ?

2 Comments

  1. March 30, 2006 at 1:21 pm

    अच्छी रचना है, बधाई.
    समीर

  2. March 30, 2006 at 4:53 pm

    बहुत अच्छी कविता है। उम्मीद है कि आपकी रचनाधर्मिता ‘शब्दायन’ पर इसी तरह प्रस्फुटित होती रहेगी।


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