मैं

किस तरह
तुम्हें याद करूँ ?

आखिर
कौन-सी बात है
जिससे जोड़ कर
तुम्हें महसूस सकूँ ?

कहाँ हैं वे चीज़ें
जिनमें बसती हो
गन्ध तुम्हारी ?

कैसे सोचूँ आज
फिर से
तुम्हारी स्मृति को?

जब जानता हूँ
कि तुम
अपना सब-कुछ
समेट कर ले गई हो।

पर तुम्हें नही पता शायद ;
तुम्हारी एक चीज़ छूट गई है,

जरा देखना, कहीं वह “मैं” तो नही ?