भाव
March 25, 2006 at 5:55 am (कविता)
गहराई,
सागर की नहीं,
मन की गहराई,
और उस गहराई में
गोते लगाते विचार
हमारे सोच को देते ऊँचाई ।
डर,
डूबने का नहीं,
कुछ भी न पाने का,
और कुछ खो जाने,
समझ न पाने का डर ।
लहरें,
नदी की नहीं,
भावनाओं की लहरें,
व्यथित मनोभावों की,
छटपटाते आहों की लहरें ।
-दीपक
समीर लाल said,
March 25, 2006 at 5:20 pm
“मन की गहराई,
और उस गहराई में
गोते लगाते विचार
हमारे सोच को देते ऊँचाई ।”
बहुत उम्दा चित्रण है.
समीर लाल
kumar said,
March 26, 2006 at 11:33 am
tussi gr8 ho paaaji………