भाव

गहराई,
सागर की नहीं,
मन की गहराई,
और उस गहराई में
गोते लगाते विचार
हमारे सोच को देते ऊँचाई ।

 

           डर,
           डूबने का नहीं,
           कुछ भी न पाने का,
           और कुछ खो जाने,
           समझ न पाने का डर ।

 

लहरें,
नदी की नहीं,
भावनाओं की लहरें,
व्यथित मनोभावों की,
छटपटाते आहों की लहरें ।

                            -दीपक

2 Comments

  1. March 25, 2006 at 5:20 pm

    “मन की गहराई,
    और उस गहराई में
    गोते लगाते विचार
    हमारे सोच को देते ऊँचाई ।”

    बहुत उम्दा चित्रण है.
    समीर लाल

  2. kumar said,

    March 26, 2006 at 11:33 am

    tussi gr8 ho paaaji………


Post a Comment