सत्य की उजली डाली जो,
काली रातों में चमकती थी
कालिख से भी काली हुई,
सच्चाई ऐसे तो न बिकती थी।
इन रंग बदलते चेहरों पर,
अब मुखौटे की भी जरुरत नहीं
कल खड़े थे जिनको साथ लिये,
वो बात अब उनमें कहाँ रही
अपनों को गले लगाने में,
ज़िन्दगी भी यूँ न झिझकती थी।
प्रेम की परिभाषा भी,
बिखर गई जाने कैसे
विकल हॄदय थे जिनके यहाँ
हों बदल गए वो भी जैसे
गैरों को अपना कहने में
जीभ न ऐसे हिचकती थी।
सपनों की धुँधली छाया
है झलक रही अब भी दिल में
काली अंधियारी रातों की
वीरानी-सी इस महफिल में
फिर से होगा वैसा ही
जैसी दुनिया पहले दिखती थी।