तनहाईयाँ चारों तरफ़
आओ मुझे बहलाने
घाव मन मे जो उगे हैं
हाथ से सहलाने |
बिन तुम्हारे जीवन सुना
रंग नहीं है कोई
सांसे तो अब भी लेता हूँ
खुशबू नहीं है कोई |
बाहों मे भर लो फ़िर आज
प्रियतम मेरे कहाँ हो
एक बार बस पुकारो हमें
जीवन मेरे कहाँ हो?
March 17, 2006 at 10:44 am (कविता)
तनहाईयाँ चारों तरफ़
आओ मुझे बहलाने
घाव मन मे जो उगे हैं
हाथ से सहलाने |
बिन तुम्हारे जीवन सुना
रंग नहीं है कोई
सांसे तो अब भी लेता हूँ
खुशबू नहीं है कोई |
बाहों मे भर लो फ़िर आज
प्रियतम मेरे कहाँ हो
एक बार बस पुकारो हमें
जीवन मेरे कहाँ हो?
kumar saurabh said,
March 19, 2006 at 1:46 pm
Not good, Deepak. Is track ko chhodo. Yah sarleekaran hai. Shabdon ke apvyaya se bacho.
Kumar saurabh