कविता
March 17, 2006 at 9:49 am (कविता)
कविता
क्या तुमसे कोई नाता है मेरा;
जो हर बार खींचती हो
अपनी तरफ
और मैं भी बढ़ता जाता हूँ
अनायास
अनगढे शब्द लिये
तुम्हारी ओर,
अनुभूति के आरम्भ से
अभिव्यक्ति के सँवरने तक
कौन मेरी लेखनी से
स्याही कम कर देता है,
बता सकती हो क्या?
जाने कब मन में
आते हैं विचार
और उकेरने लगता हूँ
पन्नों पर
जाने किस चित्रकार की तरह?
ये कौन बतायेगा,
बोलो तो?
पन्क्तियों के बीच से
गुजरता हूँ इस तरह
कि कोई अक्षर
छू ना जाये मुझसे,
उनकी पवित्रता का
ध्यान रखता हूँ
क्यों भला,
बताओगी क्या?
बताओ न कविता
कुमार सौरभ said,
March 19, 2006 at 1:54 pm
भाव बहुत अच्छा है।
तन्हाईयाँ की अपेक्षा बहुत अच्छी कविता है।
प्रश्नाकुलता दिखती है।
पन्क्ति गलत लिखा है।
कविता विचार से नहीं बनती।
(सन्दर्भः काव्यशास्त्र, अग्येय का लेख विचार कविता के आन्दोलन पर, पूर्वाग्रह अन्क 114-115 में रमेश चन्द्र शाह का साक्षात्कार, महादेवी का निबन्ध काव्य पर, आचार्य शुक्ल जी का निबन्ध सूरदास और तुल्सीदास पर और भी कई)
शब्द-अपव्यय बहुत है।
कवि में सम्भावना बहुत है।
कविता शब्दों से बनती है लेकिन शब्द अनगढ़े होते हैं, यह नहीं कहा जा सकता, जो अनगढ़ी होती है, वह है भाषा।
मूल समस्या उपाय और अपेय के सारूप्य की है।