March 17, 2006 at 10:44 am (कविता)
तनहाईयाँ चारों तरफ़
आओ मुझे बहलाने
घाव मन मे जो उगे हैं
हाथ से सहलाने |
बिन तुम्हारे जीवन सुना
रंग नहीं है कोई
सांसे तो अब भी लेता हूँ
खुशबू नहीं है कोई |
बाहों मे भर लो फ़िर आज
प्रियतम मेरे कहाँ हो
एक बार बस पुकारो हमें
जीवन मेरे कहाँ हो?
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March 17, 2006 at 9:49 am (कविता)
कविता
क्या तुमसे कोई नाता है मेरा;
जो हर बार खींचती हो
अपनी तरफ
और मैं भी बढ़ता जाता हूँ
अनायास
अनगढे शब्द लिये
तुम्हारी ओर,
अनुभूति के आरम्भ से
अभिव्यक्ति के सँवरने तक
कौन मेरी लेखनी से
स्याही कम कर देता है,
बता सकती हो क्या?
जाने कब मन में
आते हैं विचार
और उकेरने लगता हूँ
पन्नों पर
जाने किस चित्रकार की तरह?
ये कौन बतायेगा,
बोलो तो?
पन्क्तियों के बीच से
गुजरता हूँ इस तरह
कि कोई अक्षर
छू ना जाये मुझसे,
उनकी पवित्रता का
ध्यान रखता हूँ
क्यों भला,
बताओगी क्या?
बताओ न कविता
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