लेखनी चुप-चुप सी है

लेखनी चुप-चुप सी है
गुमसुम-सी है खोई कही
भाव मन में हैं बहुत
पर,संवरता कुछ भी नहीं

अनमना-सा सुलगता हूँ
मन में है एक गांठ जैसी
हूँ खड़ा अपराधी-सा मैं
ये हुई है बात कैसी?

चिर उदार ये भाव मेरे
आज रुठे हैं पड़े,
भूल के आग्रह को
मेरे बस बगल में हैं खड़े

शब्द में बदलेंगे कब ये
शाप से कब मुक्ती होगी?
गान कोई उपजाने को
कब बनूंगा मैं वियोगी

बूझने को यायावर हूँ
अव्यक्त-व्यक्त का यह संसार
वात्सल्य-भाव से भरी कविता
आती होगी ले अपना दुलार|

दीपक कुमार का ब्लॉग

कविता तो बस जीवन है, हमें सहलाती, बहलाती, पुचकारती………

 

कई बातें चाह कर भी,हम कह नहीं पाते हैं|

भावनाओं के बहाव में हमारे शब्द बह जाते हैं|

कुछ लम्हें जिनमें हम सोचते जाते हैं|

शब्दों के रूप में उभरकर वे विचार कवितायें बन जाते हैं।

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