लेखनी चुप-चुप सी है
March 16, 2006 at 5:28 pm (कविता)
लेखनी चुप-चुप सी है
गुमसुम-सी है खोई कही
भाव मन में हैं बहुत
पर,संवरता कुछ भी नहीं
अनमना-सा सुलगता हूँ
मन में है एक गांठ जैसी
हूँ खड़ा अपराधी-सा मैं
ये हुई है बात कैसी?
चिर उदार ये भाव मेरे
आज रुठे हैं पड़े,
भूल के आग्रह को
मेरे बस बगल में हैं खड़े
शब्द में बदलेंगे कब ये
शाप से कब मुक्ती होगी?
गान कोई उपजाने को
कब बनूंगा मैं वियोगी
बूझने को यायावर हूँ
अव्यक्त-व्यक्त का यह संसार
वात्सल्य-भाव से भरी कविता
आती होगी ले अपना दुलार|