बोलते अक्षर

अक्षर,
जो क्षय नहीं होते
मानव की भांति नहीं रोते
अंकित हो जाते हैं हॄदय पर
पुकारते हैं अपनी आवाज से,
हां, अक्षर भी बोलते हैं
तुमने सुनी नहीं अब तक
शायद तुम पढ़ते-लिखते
रहे हो
अक्षरों को
जानते नहीं सच!
बोलने वाले अक्षर नये नहीं हैं
सदियों से सुना रहे हैं
दास्तान अपनी,
शब्दों से भी बड़े हैं
ये अक्षर
जो जोड़ते हैं
कभी-कभी ज़िन्दगी भी
साक्षर होने का मतलब
ये नहीं कि तुम सुन पाओगे
अक्षरों की ध्वनि से परिचित हो
गाथाओं को बुन पाओगे,
क्योंकि
तुम तो क्षणिक हो,
अविनशि एवम् निरन्तर जो हैं
वे क्षणभन्गुर नहीं होते
अक्षर
जो क्षय नहीं होते.

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