निष्कासन
March 16, 2006 at 5:33 pm (Uncategorized)
सुनो सूत्रधार,
अब आ चुका है समय
कि मैं बताऊँ तुम्हें,
कि तुम भटक चुके हो
लांघ चुके हो अपनी सीमायें
यह भूल कर कि
तुम बस एक कड़ी हो
नाटक और मेरे बीच।
मैं, दर्शक-दीर्घा का एक दर्शक
जो तुम्हारे लिये अदना ही रहा हमेशा,
अब और मूक नहीं रह सकता,
क्योंकि अधिकार है मुझ को
तुम्हे मर्यादायें तुम्हारी याद दिलाने का;
तुम्हें, जिसका होना मुझसे ही है।
मानो कि तुम्हारी जगह नेपथ्य-भर है,
जहाँ से प्रेषित करते हो संवाद,
जो कोई और रचता है।
बहुत कर ली तुमने मनमानी,
जब चाहा बदल दिया दॄश्य,
बदला पात्रों और कहानियों को।
कभी ‘तोल्सतोय’ की ‘अन्ना करेनिना’को
बना दिया ‘रविन्द्र’ की ‘विनोदिनी’;
‘शरत’ की ‘चन्द्रमुखी’ से करवाया
अभिनय ‘तुलसी’ की ‘सीता’ का।
तुम ने कैसे मान लिया कि
सब कुछ तुमसे है?
क्या कला कभी हो सकती है छोटी
किसी कलाकार के सामने?
दे सकते हो तुम
इन प्रश्नों के उत्तर?
कला की प्रगतिशीलता के नाम पर
कर लिये तुम ने कई मज़ाक।
आज तुम खड़े हो कठघरे में ,
उन के साथ जो दम्भ भरते हैं
साहित्य के उन्नयन का;
जो बनाते हैं फ़िल्में
साहित्यिक कॄतियों पर,
रचते हैं इनका व्यवसायपरक संस्करण।
पर अब और नहीं थोप सकते
तुम मुझ पर यह सब।
प्रपंच कला के प्रसार के
अपराधी हो तुम ,
और मैं तुम्हें
आज, अभी, इसी वक़्त
निष्कासित करता हूँ
इस प्रेक्षागॄह से।
अभय said,
March 19, 2006 at 9:08 am
अच्छी कविता है, लिखते रहिये
कुमार सौरभ said,
March 19, 2006 at 1:55 pm
कविता बहुत अच्छी है. लिखते रहो।
कुछेक जगह उचित वाक्य-सारूप्य नहीं है।
Shashi Singh said,
April 2, 2006 at 5:01 pm
बहुत अच्छे दीपक, ऊंची सोच रखते हो. हमारी शुभकामनाएं!