निष्कासन

सुनो सूत्रधार,
अब आ चुका है समय
कि मैं बताऊँ तुम्हें,
कि तुम भटक चुके हो
लांघ चुके हो अपनी सीमायें
यह भूल कर कि
तुम बस एक कड़ी हो
नाटक और मेरे बीच।

मैं, दर्शक-दीर्घा का एक दर्शक
जो तुम्हारे लिये अदना ही रहा हमेशा,
अब और मूक नहीं रह सकता,
क्योंकि अधिकार है मुझ को
तुम्हे मर्यादायें तुम्हारी याद दिलाने का;
तुम्हें, जिसका होना मुझसे ही है।

मानो कि तुम्हारी जगह नेपथ्य-भर है,
जहाँ से प्रेषित करते हो संवाद,
जो कोई और रचता है।
बहुत कर ली तुमने मनमानी,
जब चाहा बदल दिया दॄश्य,
बदला पात्रों और कहानियों को।
कभी ‘तोल्सतोय’ की ‘अन्ना करेनिना’को
बना दिया ‘रविन्द्र’ की ‘विनोदिनी’;
‘शरत’ की ‘चन्द्रमुखी’ से करवाया
अभिनय ‘तुलसी’ की ‘सीता’ का।

तुम ने कैसे मान लिया कि
सब कुछ तुमसे है?
क्या कला कभी हो सकती है छोटी
किसी कलाकार के सामने?
दे सकते हो तुम
इन प्रश्नों के उत्तर?

कला की प्रगतिशीलता के नाम पर
कर लिये तुम ने कई मज़ाक।
आज तुम खड़े हो कठघरे में ,
उन के साथ जो दम्भ भरते हैं
साहित्य के उन्नयन का;
जो बनाते हैं फ़िल्में
साहित्यिक कॄतियों पर,
रचते हैं इनका व्यवसायपरक संस्करण।
पर अब और नहीं थोप सकते
तुम मुझ पर यह सब।
प्रपंच कला के प्रसार के
अपराधी हो तुम ,
और मैं तुम्हें
आज, अभी, इसी वक़्त
निष्कासित करता हूँ
इस प्रेक्षागॄह से।

बोलते अक्षर

अक्षर,
जो क्षय नहीं होते
मानव की भांति नहीं रोते
अंकित हो जाते हैं हॄदय पर
पुकारते हैं अपनी आवाज से,
हां, अक्षर भी बोलते हैं
तुमने सुनी नहीं अब तक
शायद तुम पढ़ते-लिखते
रहे हो
अक्षरों को
जानते नहीं सच!
बोलने वाले अक्षर नये नहीं हैं
सदियों से सुना रहे हैं
दास्तान अपनी,
शब्दों से भी बड़े हैं
ये अक्षर
जो जोड़ते हैं
कभी-कभी ज़िन्दगी भी
साक्षर होने का मतलब
ये नहीं कि तुम सुन पाओगे
अक्षरों की ध्वनि से परिचित हो
गाथाओं को बुन पाओगे,
क्योंकि
तुम तो क्षणिक हो,
अविनशि एवम् निरन्तर जो हैं
वे क्षणभन्गुर नहीं होते
अक्षर
जो क्षय नहीं होते.

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