मैं

किस तरह
तुम्हें याद करूँ ?

आखिर
कौन-सी बात है
जिससे जोड़ कर
तुम्हें महसूस सकूँ ?

कहाँ हैं वे चीज़ें
जिनमें बसती हो
गन्ध तुम्हारी ?

कैसे सोचूँ आज
फिर से
तुम्हारी स्मृति को?

जब जानता हूँ
कि तुम
अपना सब-कुछ
समेट कर ले गई हो।

पर तुम्हें नही पता शायद ;
तुम्हारी एक चीज़ छूट गई है,

जरा देखना, कहीं वह “मैं” तो नही ?

भाव

गहराई,
सागर की नहीं,
मन की गहराई,
और उस गहराई में
गोते लगाते विचार
हमारे सोच को देते ऊँचाई ।

 

           डर,
           डूबने का नहीं,
           कुछ भी न पाने का,
           और कुछ खो जाने,
           समझ न पाने का डर ।

 

लहरें,
नदी की नहीं,
भावनाओं की लहरें,
व्यथित मनोभावों की,
छटपटाते आहों की लहरें ।

                            -दीपक

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