March 30, 2006 at 7:08 am (कविता)
किस तरह
तुम्हें याद करूँ ?
आखिर
कौन-सी बात है
जिससे जोड़ कर
तुम्हें महसूस सकूँ ?
कहाँ हैं वे चीज़ें
जिनमें बसती हो
गन्ध तुम्हारी ?
कैसे सोचूँ आज
फिर से
तुम्हारी स्मृति को?
जब जानता हूँ
कि तुम
अपना सब-कुछ
समेट कर ले गई हो।
पर तुम्हें नही पता शायद ;
तुम्हारी एक चीज़ छूट गई है,
जरा देखना, कहीं वह “मैं” तो नही ?
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March 25, 2006 at 5:55 am (कविता)
गहराई,
सागर की नहीं,
मन की गहराई,
और उस गहराई में
गोते लगाते विचार
हमारे सोच को देते ऊँचाई ।
डर,
डूबने का नहीं,
कुछ भी न पाने का,
और कुछ खो जाने,
समझ न पाने का डर ।
लहरें,
नदी की नहीं,
भावनाओं की लहरें,
व्यथित मनोभावों की,
छटपटाते आहों की लहरें ।
-दीपक
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