शब्द

(१)

शब्दों के खण्डहर 

अतीत से जुड़े हैं,

जहाँ कभी 

बिन शब्दों के 

बातें होती थीं।

 

 (२)

शब्दों से 

बुनता हूँ 

घरौन्दा,

और अर्थों से

तुम

सजाती हो उसे।

 

(३)

शब्द 

नहीं कह सकेंगे

मेरी बातें,

अच्छा है

मैं खामोश रहूँ

और तुम सुनती रहो।

 

(४)

बदल जाते हैं 

अर्थ

कई बार,

मगर

शब्द वही रहते हैं।

 

(५)

बस इतना ही

कि

जब भी कोई

शब्द कहूँ

वह

तुम्हारा ही नाम हो।

 

(६) 

कुछ शब्द 

ठहर जाते हैं

एक जगह,

उनके अर्थ 

निकल जाते हैं 

दूर कहीं।

 

(७)

वाक्य ने कहा-

मैं हूँ

तभी शब्द भी हैं,

शब्द 

एक -एक कर

खिसक गए,

फिर वाक्य

कहीं नहीं था।

पातियां

कुछ अधूरी पातियां,
आज फिर से पड़ीं हैं
सामने मेरे
जो मैनें लिखीं थीं कभी
किसी के नाम
शब्दों को सजाया था
बड़े जतन से
किसी को अपना जानकर
पर कुछ पंक्तियाँ लिखने के बाद
छोड़ दिया था यूं ही|

समय तब से आज तक
कई बरस गुज़ार चुका है,
आज अचानक स्मृतियों ने
आवाज़
दी है मुझे
और मैं सामने हूँ
उन्हीं अधूरी पातियों के|
उन्हें अब भी आस है शायद
कि  उनकी मंज़िल आयेगी ,
पर मैं जानता हूँ
टूटे सपनों का कोई
अर्थ नहीं होता|
ये सपने बस रह जाते हैं
हृदय में ,
और कभी-कभी
अपने मौजूद होने का
दिलाते हैं एहसास
उन्हीं पातियों की तरह|

« Older entries