पातियां

कुछ अधूरी पातियां,
आज फिर से पड़ीं हैं
सामने मेरे
जो मैनें लिखीं थीं कभी
किसी के नाम
शब्दों को सजाया था
बड़े जतन से
किसी को अपना जानकर
पर कुछ पंक्तियाँ लिखने के बाद
छोड़ दिया था यूं ही|

समय तब से आज तक
कई बरस गुज़ार चुका है,
आज अचानक स्मृतियों ने
आवाज़
दी है मुझे
और मैं सामने हूँ
उन्हीं अधूरी पातियों के|
उन्हें अब भी आस है शायद
कि  उनकी मंज़िल आयेगी ,
पर मैं जानता हूँ
टूटे सपनों का कोई
अर्थ नहीं होता|
ये सपने बस रह जाते हैं
हृदय में ,
और कभी-कभी
अपने मौजूद होने का
दिलाते हैं एहसास
उन्हीं पातियों की तरह|

प्यार और विश्वास

केवल मैं ही तुम्हें प्यार नहीं करता|

हाँ, यह सच है

केवल मैं ही तुम्हें प्यार नहीं करता|

मेरे कान

तुम्हारे शब्दों से प्रेम करते हैं,

तुम्हारे हाथों को चाहती हैं

मेरी उंगलियाँ,

मेरी नजरें भी

तुम्हारे चेहरे को ही

ढूँढती हैं,

मेरे होठ भी

तुम्हारे होठों के

स्पर्श की बाट जोहते हैं;

और इन सबके बाद भी

जब तुम कहती हो

कि

तुम मुझे प्यार नहीं करते,

तब-

मेरा विश्वास प्यार पर से

उठने-उठने को होता है,

और मैं घबराकर

दूर चला जाता हूँ तुमसे

तभी-

निगाहों में तुम झलक जाती हो

और तब

मेरा विश्वास

इस प्यार पर

और भी  गहरा जाता है|

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