अक्टूबर 9, 2011 at 2:40 अपराह्न (कविता)
तयशुदा
नियत-से
जीवन में,
जब भी कुछ
अचानक से
घटता है –
अप्रत्याशित,
अनचाहा –
जी रहा आदमी
रह जाता है
भौंचक्का,
जैसे
पटरी से उतर गयी हो
एक रेलगाड़ी,
छोटा बच्चा
ठोकर लगने से
गिर गया हो जैसे,
मगर कुछ समय बाद
आदमी समझ जाता है ,
जान जाता है सच्चाई
कि नहीं होता कुछ भी
नियत या तयशुदा,
सब बस खेल हैं
नियति के;
और वह
चल पड़ता है पुन:
अगली बार
भौचक्का होने तक |
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जून 20, 2009 at 10:12 पूर्वाह्न (कविता)
(१)
शब्दों के खण्डहर
अतीत से जुड़े हैं,
जहाँ कभी
बिन शब्दों के
बातें होती थीं।
(२)
शब्दों से
बुनता हूँ
घरौन्दा,
और अर्थों से
तुम
सजाती हो उसे।
(३)
शब्द
नहीं कह सकेंगे
मेरी बातें,
अच्छा है
मैं खामोश रहूँ
और तुम सुनती रहो।
(४)
बदल जाते हैं
अर्थ
कई बार,
मगर
शब्द वही रहते हैं।
(५)
बस इतना ही
कि
जब भी कोई
शब्द कहूँ
वह
तुम्हारा ही नाम हो।
(६)
कुछ शब्द
ठहर जाते हैं
एक जगह,
उनके अर्थ
निकल जाते हैं
दूर कहीं।
(७)
वाक्य ने कहा-
मैं हूँ
तभी शब्द भी हैं,
शब्द
एक -एक कर
खिसक गए,
फिर वाक्य
कहीं नहीं था।
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